Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 95
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 95 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 95
संस्कृत श्लोक
बीजेऽन्तर्वृक्षविस्तारः स्थितः सफलपल्लवः ।
परया दृश्यते दृष्ट्या जगच्च चिदणूदरे ॥ ९५ ॥
हिन्दी अर्थ
बीज के अन्दर जैसे वृक्ष रहता है, इस अंश का वर्णन करते हैं।
जैसे बीज के अन्दर फल पल्लवं से युक्त वृक्ष का विस्तार स्थित है ओर वह परमार्थदृष्टि
से (योगपरिष्कृत दृष्टि से) देखा जाता है, वैसे ही चिदणु के अन्दर अनेक शाखा प्रशाखाओं
से स्थित यह जगत् परमार्थदृष्टि से (ब्रह्मदृष्टि से) देखा जाता है