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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 97–101

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 97–101 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 97-101

संस्कृत श्लोक

संस्थितं द्वैतमद्वैतं बीजकोश इव द्रुमः । जगच्चित्परमाण्वन्तर्यः पश्यति स पश्यति ॥ ९७ ॥ न द्वैतं नैव चाद्वैतं न च बीजं न चाङ्कुरः । न स्थूलं न च वा सूक्ष्मं नाजातं जातमेव च ॥ ९८ ॥ न चास्ति न च नास्तीदं न सौम्यं क्षुभितं न च । त्रिजगच्चिदणोरन्तः खवाय्वपि न किंचन ॥ ९९ ॥ न जगन्नाजगच्चास्ति विद्यते चित्परा शुभा । सर्वात्मिका यदा यत्र सा यथोदेति तत्तथा ॥ १०० ॥ उदेत्यनुदितोऽप्येष स्वयंवेदनजृम्भितः । परमात्माणुरेकात्मा समग्रात्मतयैव खे ॥ १०१ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी एकता का त्याग न करता हुआ उदित न हुआ भी कौन उदित होता है, इस प्रश्न में स्थित स्वमेकमजहद्गूपम्‌” इन अशो का उपपादन करने के लिए अध्यारोपित स्थूल, सूक्ष्म आदि प्रपंचका खण्डन करते है। बीज के अन्दर वृक्षके समान चित्परमाणु के अन्दर स्थित द्वैतरूप जगत्‌ को जो उद्वत देखता है, उसीका दर्शन दर्शन है यानी वही तत्त्वज्ञानी है, वस्तुतः न द्वैत हे, न अद्वैत है, न बीज है, न अंकुर है, न स्थूल है, न असत्ता है, न यह सौम्य हे, न क्षुभित हे, चिदणु के अन्दर तीनों जगत्‌, आकाश, वायु आदि भी कुछ नहीं है न जगत्‌ है, न अजगत्‌ है, केवल एक सर्वोत्कृष्ट उत्तम चिति हे । कौन उदित न होता हुआ भी उदित होता है, इस अंश का उपपादन करते है। वह चिति सर्वात्मिका है, वह जहाँ जिस रूपसे (प्राक्तन वासना के अनुसार) उदित होती है, वहाँ पर सृष्टि प्रतिभारूपसे आविर्भूत होती है । उदित न होता हुआ भी यह एकात्मा परमाणु अपने संकल्प से विकास को प्राप्त होकर निष्प्रपंचस्वरूप आकाश में समग्र वस्तुरूप से स्थित हे