Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 14–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verses 14–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 14-16
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिरेषा यथाऽऽयाता तथा यातु रघूद्वह ।
ज्ञास्यसे तत्प्रबुद्धस्त्वमेनां केवलमुत्सृज ॥ १४ ॥
भ्रान्तिग्रन्थौ वित्रुटिते मदुक्तिश्रवणात्ततः ।
ज्ञानशब्दार्थभेदानां वस्तु ज्ञास्यस्यलं स्वयम् ॥ १५ ॥
चित्तादियमनर्थश्रीस्तच्च सा चेतरा च ते ।
मदुक्तिश्रवणादेव शान्तिमेष्यत्यसंशयम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामजी, यह तो भ्रान्ति ही है, यह जैसे किसी कारण के बिना आई वैसे ही जाये । प्रबुद्ध होकर
आप उस ब्रह्म को जान जायेंगे। इस समय आप इस भ्रान्ति का त्याग कीजिए मेरे वाक्यो के
श्रवण से भ्रान्तिरूप ग्रन्थि के टूट जाने पर तदनन्तर यद्यपि आप ज्ञान, शब्द, अर्थ इनके भेद
को नहीं जानेंगे, तथापि मेरे उपदेश की तात्पर्यगोचर वस्तु को स्वयं ही जान जायेगे । चित्त से
ही यह सम्पूर्ण अनर्थ उत्पन्न हुआ है । चित्त, वह चित्तजनित अनर्थ ओर चित्तजननी अविद्या-
ये सब मेरे कथन के श्रवणमात्र से आपके शान्त हो जायेंगे, इसमें सन्देह नहीं हे