Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणः सर्वमुत्पन्नं सर्वं ब्रह्मैवमेति च ।
मद्गीर्भिः संप्रबुद्धः सन् ज्ञास्यस्यलमनिन्दितम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् की उत्पत्ति आदि के निरूपण का भी प्रयोजन निष्प्रपव वस्तु का ज्ञान ही है, इस
आशय से कहते हैं।
सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म से ही उत्पन्न हुआ है और लय द्वारा ब्रह्म को ही प्राप्त होता है, मेरी
वाणियों द्वारा प्रबुद्ध होकर आप इस अनिन्दित तत्त्वको पूर्णरूप से जानेंगे