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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 87, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 87, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अथ ते शान्तबाह्यार्था ब्रह्मत्वे कृतभावनाः । तस्थुश्चतुर्युगस्यान्ते यावत्कल्पः क्षयं गतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वे एेन्दव ब्राह्मण, जिन्होंने अपनी ब्रह्मता में यानी मं ब्रह्मा हूँ” ऐसी भावना कर रक्खी थी ओर जिनका बाह्य व्यापार विरत था, तब तक स्थित रहे, जब तक अवशिष्ट चार युगो के अन्त में कल्प नष्ट हुआ