Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 87, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 87, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
क्षीयमाणे ततः कल्पे तपत्यादित्यसंचये ।
पुष्करावर्तकेषूच्चैर्वर्षत्सु कठिनारवम् ॥ ५ ॥
वहत्सु कल्पवातेषु स्थित एकमहार्णवे ।
क्षीणेषु भूतवृन्देषु ते तथैव व्यवस्थिताः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
कल्पित ब्रह्माण्ड में सृष्टि आदि में व्यग्र होकर स्थित रहे