Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 92, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 92, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

शापेन मन्त्रवीर्येण मनोबुद्धीन्द्रियाण्यपि । सर्वाण्येव विमूढानि दृष्टानि किल जन्तुषु ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

देखा गया है कि शाप द्वारा और मन्त्र की शक्ति द्वारा प्राणियों के मन, बुद्धि, इन्द्र्यो आदि सभी मूढ हो जाते हैं देखिये न, शापसे अजगर बने हुए राजा नहुषकी स्ववंशज भीम को डैँसने में प्रवृत्ति हुई थी । वैसे ही शाप से राक्षस बने हुए अतिधार्मिक राजा सौदासकी बुद्धि के व्यामोहसे ब्राह्मणवध आदि पाप में प्रवृत्ति हुई थी । शाप से गन्धर्वराज की धृतराष्ट्र जन्म में चक्षुरिन्द्रिय का विनाश हुआ था, ऐसा एक-आध जगह ही नहीं, अनेक जगह देखा गया है