Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 10, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 10, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
जङ्घोरुजानुदोर्दण्डैर्द्विगुणां दीर्घतां गतैः ।
प्रतिष्ठानमिवाशान्तं दीर्घाध्वश्रमभीतितः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
दीर्घं परलोकमार्ग के परिश्रम से उसे भय
था, अतएव फूल कर दुगने हुए आठ अंगों से जाँघ, घुटनों, बाहुदण्डो ओर उरुओं से आठ दिशाओं के
प्रति प्रस्थान करता हुआ सा वह स्थित था। भाव यह कि उनसे पृथक् होकर वह भागना चाहता था