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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

केवलं तावकीं चिन्तामनालोक्य यदा वयम् । भगवन्भवते क्रुद्धा याताः स्मस्तेन बाध्यताम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व वर्णित रीति से अपराध के रहते भी क्रोध करना उचित नहीं है, यदि अपराध बिलकुल न हो, उसे अपराध मानकर क्रोध किया जाय, तो क्रोध करनेवाले को ही दण्ड देना उचित है, ऐसा कहते है। भगवन्‌, केवल आपके एकमात्र नियम परिपालनरूप कार्य का विचार न कर यानी आप केवल नियम का परिपालन करते हैं किसी के प्रति रागद्वेष से किसी का हनन नहीं करते इसका विचार न कर (०७) यहाँ पर भृगु अपने शरीर से निकलकर उन-उन समंगातटपर्यन्त सब प्रदेशों में क्रमशः पुत्र के वृत्तान्त को देखकर फिर वापिस आकर अपने शरीर में प्रविष्ट हुए, ऐसी भ्रान्ति नहीं करनी चाहिये क्योकि योगबल से अपने स्थान में सब कुछ देखा जा सकता है ओर निकल कर घूमने पर भूत ओर भविष्य वृत्तान्त का दर्शन योगदृष्टि के बिना नहीं हो सकता इसलिए 'समंगा नदी के तट से आकर अपने शरीर में प्रविष्ट हुए” इस उक्ति का तात्पर्य उसके चिन्तन को छोड़कर उन्होने केवल शरीर का संधान किया, इसमें समझना चाहिये । जब हम आपके लिए क्रुद्ध हुए तब हम ही आपके दण्डनीय हो गये हैं