Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 11, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
कल्पनान्या जगन्नाम्नी नासीदस्ति भविष्यति ।
ब्रह्मणो जगतो भेदो मनागपि न विद्यते ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल में अनेक लहर वृद्धि को प्राप्त होती हैं वैसे ही ब्रह्म मे ब्रह्म ही जगत
रूप से वृद्धि को प्राप्त हुआ हे । स्त्री, पुरुष ओर नपुंसक रूप से ब्रह्म ही परिवर्तित होता है ।४४॥ ब्रह्म
से भिन्न जगत नाम की न तो कोई कल्पना कभी थी, न है और न होगी । जगत का ब्रह्म से रत्तीभर भी
भेद नहीं है