Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 14, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 14, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
न तथा सुखयन्त्यन्तर्निर्मलामृतवृष्टयः ।
यथा प्रहर्षयन्त्येता महतामेव दृष्टयः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्मल अमृत की वृष्टि अन्तरात्मा को वैसा सुखी नहीं बनाती है जैसा कि आप महात्माओं की केवल यह
दृष्टि सुखी बना रही है