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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 16, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 16, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

काल उवाच । समङ्गातापसीमेतां तनुं संत्यज्य भार्गव । प्रविशेमां तनुं साधो नगरीमिव पार्थिवः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

काल ने कहा : हे परकार्यं साधक भृगुपुत्र, समंगा नदी के तट के इस तपस्वी शरीर का परित्याग कर जैसे राजा नगरी में (राजधानी में) प्रवेश करता हे वैसे ही आप इस देह में प्रवेश कीजिये