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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verses 13–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 13 ,14

संस्कृत श्लोक

एवमेव वयं चेमे संपन्ना रघुनन्दन । स्वसंकल्पात्मकाकारा मिथ्यासत्यत्वभाविनः ॥ १३ ॥ एवंरूपैव हि परे विद्यते सर्गसंततिः । न वास्तवी वस्तुता तु संस्थितैवमवस्तुनि ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रघुनन्दन, शुक्र के तुल्य ही अपने संकल्परूप आकारवाले मिथ्या को सत्य समझनेवाले ये तुम लोग भी उत्पन्न हुए हैं। हिरण्यगर्भ में भी इसी प्रकार की यह सृष्टि परम्परा विद्यमान है, यह वास्तविक नहीं है, अवस्तु मेँ वस्तुता अन्धपरम्परा से ही स्थित है