Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
प्रत्येकमुदितं विश्वमेवमेव मुधैव हि ।
वनगुल्मकरूपेण वसन्तैकरसो यथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे एकमात्र वसन्त ऋतु का रस ही वन, लता, गुल्म
आदिरूप से उदित होता है वैसे ही एक मात्र परब्रह्म ही प्रत्येक में मिथ्या विश्वरूप से उदित हुआ है।
भाव यह है कि सम्पूर्ण जीवों के आकाररूप से ब्रह्म ही उदित हुआ है