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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

केचित्पृथक्स्थितिगताः पृथगेव लयं गताः । केचिन्मिथः संमिलिता जगद्गुञ्जा स्थिताक्षता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई सृष्टिरूपी जलाशय दूसरी सृष्टि में मिले बिना ही पृथक्‌ स्थिति को प्राप्त है और अन्य सृष्टियों में मिले बिना ही लय को प्राप्त हुए हैं। कोई परस्पर संमिलित हैं । इस प्रकार ब्रह्माण्डरूपी गुंजाफल अक्षुण्ण स्थित हैं