Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verses 6–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
जगद्रुञ्जासहस्राणि यत्रासंख्यान्यणावणौ ।
अपरस्परलग्नानि काननं ब्रह्म नाम तत् ॥ ६ ॥
मिथः संमिलनेनैता घनतां समुपागताः ।
यद्यद्यत्र यथा रूढं तत्तत्पश्यति नेतरत् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसमें प्रत्येक अणु मेँ असंख्य हजारों ब्रह्माण्डरूपी गुंजाफल एक दूसरे से मिले बिना स्थित हैं,
वह ब्रह्म मायाशबल नाम का वन ह ये जगद्रूपी गुंजाफल परस्पर मिलने से निबिड़ता को (साधारण
व्यवहार योग्यता को) प्राप्त हो गये हैं।
शंका : क्या सब पदार्थ सबके दर्शन योग्य हैं ?
समाधान : नहीं सब पदार्थ सबके दर्शन योग्य नहीं हैं । जिस प्राणी का जिस प्रकार के कर्मो का
भोगानुकूल फल जहाँ पर जैसा रहता है, वहाँ पर उतना ही वह देखता है। अन्य लोक में स्थित अधिक
का उसे दर्शन नहीं होता