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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

यदा पित्तादिनाक्रान्तस्तदा ग्रीष्मादिसंभ्रमम् । अन्तरेवामुभवति स्फारं बहिरिवाखिलम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जब यह जीवचेतन नाडी के अन्तर्गत पित्त से आक्रान्त होता है, तब बाहर की तरह सम्पूर्ण ग्रीष्म आदि के भ्रम का अपने अन्दर ही अनुभव करता हे