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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

ततस्तमेव निर्णीय तमेव च विकल्पयन् । अन्तःस्थया रञ्जनया रञ्जयन्स्वामहंकृतिम् ॥ १४ ॥ तन्निश्चयमुपादाय तत्रैव रसमृच्छति । यन्मयत्वं शरीरे तु ततो बुद्धीन्द्रियेषु च ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए अपनी-अपनी वासना से कल्पित का ही युक्ति से निर्णय कर उसी का पुनः पुनः विकल्प करते हुए, अपने द्वारा कल्पित पदार्थ से स्वीयतारूपी रंग से अपने अहंकार को रंगते हुए यानी उसके आकार को प्राप्त करते हुए उसके निश्चय को प्राप्त होकर वह मन उसीमे पुनः पुनः आस्वादनरूप चमत्कार को प्राप्त होता है । शरीर में जैसा मन होता है उसके बाद बुद्धि ओर इन्द्रियों में भी वैसा ही हो जाता है