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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

मुक्तौ तु नान्यथा प्राप्तिरिति भावितचेतसः । स्वां दृष्टिं प्रविवृण्वन्ति स्वैरेव नियमभ्रमैः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

हममें परिकल्पित उपाय के बिना किसी को भी मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती, इस प्रकार के निश्चय से युक्त वे अपने ही द्वारा कल्पित नियम भ्रमो से यानी तप्तशिलारोहण आदि साधन नियमभ्रमों से अपनी दृष्टि को प्रकाशित करते हैं