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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 57–59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verses 57–59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 57-59

संस्कृत श्लोक

तत्तत्फलं तदाकारं तावत्कालं प्रपश्यति । न तदस्ति न यत्सत्यं न तदस्ति न यन्मृषा ॥ ५७ ॥ यद्यथा येन निर्णीतं तत्तथा तेन लक्ष्यते । भाविताकाशमातङ्गं व्योमहस्तितया मनः ॥ ५८ ॥ व्योमकाननमातङ्गीं व्योमस्थामनुधावति । तस्मात्संकल्पमेव त्वं सर्वभावमयात्मकम् ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

वह वस्तु नहीं है, जो सत्य न हो, ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो मिथ्या न हो । जिसका जिसने जिस प्रकार निर्णय किया, वह उसको उस प्रकार दिखाई देता है। जिस मन ने अपने में आकाशगज की भावना की है, वह आकाशगज के रूप से आकाश स्थित आकाशवन की हथिनी के पीछे कामातुर होकर चलता है । इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, आप सुषुप्ति में स्थित होकर सब पदार्थमय संकल्प का त्याग कीजिये, अपने पारमार्थिक अद्वितीयानन्द आत्मरूप से स्थित होइये । अपारमार्थिक दुःखरूप से स्थित न होड्ये