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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verses 5–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 23, verses 5–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

नेत्रवातायनोद्द्योतप्रकाशभुवनान्तरा । करप्रतोलीविस्तारप्राप्तपादोपजाङ्गला ॥ ५ ॥ रोमराजीलतागुल्मा त्वचाजालकमालिता । गुल्फाङ्गुल्यां प्रविश्रान्तजङ्घोरुस्तम्भमण्डला ॥ ६ ॥ रेखाविभक्तपादाग्रशिलाप्रथमनिर्मिता । चर्ममर्मशिरासारसंधिसीमामनोरमा ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसमें नेत्ररूपी झरोखों में स्थित इन्द्रियरूपी दो दीपों से अन्यान्य भुवन प्रकाशमान हैं, भुजारूपी सड़कों के विस्तार से पादरूपी उपवन प्राप्त हे, रोमराजि ही लताओं की झाड़ियाँ हैं, त्वचा में स्थित विविध नसों से यह व्याप्त है, इसमें एड़ी और पैर की अंगुलियों में जंघा ओर उरुरूपी खम्भे खड़े है, सामुद्रिक शास्त्र में कही गई रेखाओं से विभक्त पादतलरूपी शिला की नींव से यह निर्मित हे । इसके बाहर त्वचारूपी सीमा, भीतर मर्मस्थानरूपी सीमा, बीच-बीच में नसों की शाखारूपी सीमा और हड्डियों में सन्धिरूपी सीमा हैं, इन सीमाओं से यह मनोरम है