Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 24, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 24, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
प्रयच्छति परां सिद्धिं त्यक्त्वात्मानं मनःपिता ।
सुदृष्टः सुपरामृष्टः सुदृढः सुप्रबोधितः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
भाग्यवश खान में देखी
गई, सान की खराद से स्वच्छ की गई, प्रकाशक रस से प्रक्षालन द्वारा अच्छी तरह चमकीली बनाई गई,
हजारों घनो के भी आघात से अभेद्य, सुन्दर सूतवाले सुवर्ण के हार आदि में लगाई गई मनोहर मणि
जैसे हृदय में शोभित होती है, वैसे ही शास्त्रदर्शित परीक्षा द्वारा अच्छी तरह देखा गया, आचार्य,
सहाध्यायियों की सहायता से आत्मानुभवपर्यन्त ज्ञात हुआ, निदिध्यासन से दृढ़ हुआ तथा पंचम आदि
भूमिका भेदों मे लगाया गया उत्तम मन भासित होता हे