Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 24, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 24, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 5, 6
संस्कृत श्लोक
आपातरमणीयेषु रमते विषयेषु यः ।
विवेकधनवानस्मिन्कुकलेवरपत्तने ॥ ५ ॥
इन्द्रियारिभिरन्तस्थैरवशो नाभिभूयते ।
न तथा सुखिता भूपा मृन्मयोग्रपुरीजुषः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उन शत्रुओं पर विजय पाने के लिए पहले विवेकरूपी धन का संचय करना चाहिए, इस आशय से
कहते हैं।
जो पुरुष विवेकरूपी धन से युक्त होकर इस शरीररूपी निन्दित नगर में आपात रमणीय विषयों
में रमण करता है, वह अन्यस्थ इन्द्रियरूपी शत्रुओं से अवश होकर अभिभूत नहीं होता । उस पुरुष
के तुल्य वह राजा भी सुखी नहीं है जो मिट्टी से बनी हुई नगरी का सेवन करता है, जैसे कि अपना
शरीररूपी नगरी का ईश्वर, जिसका मन अपने अधीन है, वह सुखी होता है । मृन्मय और उग्र ये
जो पुरी के विशेषण दिये गये हैं, वे शरीररूपी पुरी उससे विलक्षण है, अतएव उत्कृष्ट है, यह बोधन
करने के लिए है