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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 25, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 1, 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्मिन्विहरतो लोके लोकारामस्य धीमतः । श्रेयसे तिष्ठतो यत्नमुत्तमार्थाभिधायिनः ॥ १ ॥ दामव्यालकटन्यायो मा ते भवतु राघव । भीमभासदृढस्थित्या त्वं विशोको भवेति च ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

वासनारहित पुरुष में भी धीरे धीरे वासनाओं का संचय होने से देहादि का अभिमान होने पर जन्म-मरण परम्परा होती है, फिर विवेक से कुछ क्षीण वासनावाले पुरुष की होती है, इसमें तो कहना ही क्या ? इस कैमुतिक न्याय के प्रदर्शन द्वारा जिनमे थोड़ा सा आत्मज्ञान प्राप्त हुआ है, जिन्हें पूर्णनिष्ठा प्राप्त नहीं हुई है, उन मन्द ओर मध्यम अधिकारियों को वासना के उच्छेद के लिए अवश्य दृढ़ प्रयत्न करना चाहिये, यह दशनिवाली दाम-व्याल-कट की आख्यायिका को कहने वाले श्रीवसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी मे उक्त आख्यायिका को चुनने की इच्छा उत्पन्न करने के लिए पूर्वोक्त का ही पुनः अनुवाद करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, आप में लोग विश्राम लेते हैं, आप बुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ है, कल्याण के लिए प्रयत्न कर रहे हैँ शम, दम आदि उत्तम पदार्थों को अपने में प्रकाशित करने का आपका स्वभाव है, इस लोक में विहार कर रहे आपका दाम-व्याल-कट-न्याय न हो और भीम- भास-दृढ़ स्थिति से आप शोकरहित होइये

सर्ग सन्दर्भ

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त प्रचीसवाँ सर्ग देवताओं द्वारा शम्बर के सेनापतियों की हत्या; दाम, व्याल ओर कट नामक सेनापतियों की उत्पत्ति ओर उनसे देवताओं पर विजय पाने की आशा का वर्णन |