Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 3, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यथेदं भासुरं भाति जगदण्डकजृम्भितम् ।
यथा कोटिसहस्राणि भान्त्यन्यान्यप्यणावणौ ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माण्ड में वृद्धि को प्राप्त यह भासमान जगत जैसे भासित हो रहा है वैसे
ही करोड़ों हजारों अन्यान्य जगत भी एक-एक अणु में भासित होते हैं