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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 31, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

शाखाप्रतानगहना संसारविषमञ्जरी । अहङ्काराङ्कुरा देव समुदेतीयमातता ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

शाखाओं के विस्तार से गहन, चारों ओर फैली हुई, भौंरों से भरी हुई संसार रूपी यह विषलता अहंकाररूपी अंकुर से ही आविर्भूत होती है