Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 32, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
स्वेन दौर्भाग्यदैन्येन न भस्माप्युपतिष्ठते ।
वेत्ति नित्यमुदारात्मा त्रैलोक्यमपि यस्तृणम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अभिलाषा की अनर्थकारिता कह कर वैराग्य की सर्वअनर्थनिवर्तकता कहते है ।
जो उदार पुरुष त्रैलोक्य को भी नित्य तृण समझता है, उसे आपत्तियाँ इस प्रकार छोड देती हे
जिस प्रकार कि साँप पुरानी केंचुल को छोड़ देते हैं