Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 32, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
तं त्यजन्त्यापदः सर्वाः सर्पा इव जरत्त्वचम् ।
परिस्फुरति यस्यान्तर्नित्यं सत्त्वचमत्कृतिः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
विरक्त पुरुष को यदि थोड़ी भी ज्ञान कणिका प्राप्त हो, तो उसकी आपत्तियाँ तो दूर हुई, बल्कि
सब देवता अपने आधारभूत ब्रह्माण्ड की तरह उसकी सदा रक्षा करते हैं, ऐसा कहते हैं।
जिसके अन्दर सदा सत्यस्वरूप ब्रह्म का चमत्कार स्फुरित होता है, उसका लोकपाल अखण्ड
ब्रह्माण्ड के समान पालन करते हैं