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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 34, Verses 2–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 34, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

तथा गगनविभ्रष्टे समस्ते ध्वस्तसंस्थितौ । विनष्टे शम्बरानीके शरदीवाब्दमण्डले ॥ २ ॥ देवनिर्जितसैन्योऽसौ नीत्वा कतिपयाः समाः । पुनर्देववधोयुक्तश्चिन्तयामास दानवः ॥ ३ ॥ दामादयस्तु रचिता ये मया माययाऽसुराः । मौर्ख्यातैर्भाविता युद्धे मिथ्यैव दुरहंकृतिः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त रीति से शम्बर की सारी सेना कि जिसकी स्थिति बिगड़ चुकी थी, आकाश से गिर कर शरत्‌काल के मेघो की घटा के समान नष्ट होने पर, देवताओं से जिसकी सेना जीती गई थी, ऐसा वह दानव कुछ वर्ष बिताकर फिर देवताओं के वध के लिए उद्यमशील हो विचार करने लगा मैंने माया द्वारा जिन दाम आदि असुरो का निर्माण किया था, उन्होने मूर्खतावश युद्ध मे व्यर्थ ही दुष्ट अहंकार की भावना की