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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 34, Verses 7–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 34, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

इति संचिन्त्य दैत्येन्द्रस्तादृशान्दानवान्धिया । माययोत्पादयामास बुद्बुदानिव वारिधिः ॥ ७ ॥ सर्वज्ञा वेद्यवेत्तारो वीतरागा गतैनसः । यथाप्राप्तैककर्तारो भावितात्मान उत्तमाः ॥ ८ ॥ भीमो भासो दृढ इति नामभिः परिलाञ्छिताः । जगत्तृणमिवाशेषं पश्यन्तः पावनाशयाः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

दैत्यराज शम्बर ने बुद्धि से ऐसा विचार कर जैसे सागर बुद्बुदों को उत्पन्न करता हे वैसे ही उस प्रकार के दानवो को माया से उत्पन्न किया, वे सर्वज्ञ थे, वेद्य आत्मतत्व उन्होंने जान लिया था, वे विरक्त ओर निष्पाप थे, जो कुछ प्रभु की आज्ञा होती थी एकमात्र उसीको करते थे, सदा आत्मनिष्ठ रहते थे, इस प्रकार के उत्तम वे दानव भीम, भास और दृढ़ इन नामों से युक्त थे । निर्मल आशयवाले वे तीनों जगत को तृण के तुल्य देखते थे