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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verses 26–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 36, verses 26–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

वसन्तमुपतिष्ठन्ति पुष्पपल्लवराशयः । निदाघविधिमायान्ति दैवदाहविभूतयः ॥ २६ ॥ प्रावृट्समयमीहन्ते नीला जलदराशयः । शरदं चानुधावन्ति समग्राः फलराशयः ॥ २७ ॥ हेमन्ते हिमहासिन्यो भवन्ति ककुभो दश । नयन्त्युपलतामम्बु शिशिरे शीतलानिलाः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

ऋतु के रूप से भी चित्तत्व ही कार्यो पर अनुग्रह करता है, ऐसा दशति है । फूल ओर पल्लवो की राशियाँ वसन्त को प्राप्त होती हँ यानी वसन्त बनकर चित्तत्त्व ही फूल, पल्लव आदि की राशियों को उत्पन्न करता हे । सूर्य के तेज की तापशक्तियाँ ग्रीष्म ऋतु को प्राप्त होती हैं यानी चिति ही ग्रीष्म ऋतु बनकर सूर्य की तापशक्तियों को उत्पन्न करती हे । ऐसा ही आगे भी समझना चाहिए । नीली मेघघटाएँ वर्षा ऋतु चाहती हैं तथा सब धान आदि की फलराशिर्यो शरद्‌ ऋतु का अनुसरण करती हैं । हेमन्त ऋतु में दशो दिशाएँ हिम यानी बर्फ रूपी हारसे युक्त होती हैं और शिशिर ऋतु में शितल वायु जल को पत्थर बना देते हे