Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
एतत्ते कथितं सर्वं स्वरूपं रूपिणां वर ।
संसारसागरश्रेण्यो यथा यान्ति प्रयान्ति च ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
किये गये इन्द्रिय विजय का प्रकृत में सम्बन्ध कहने के लिए पूर्वोक्त पदार्थ का पुनः स्मरण करते हैं ।
हे रूपवान पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, ये संसार सागर की श्रेणियाँ जैसे प्राप्त होती हैं और
विनष्ट होती हैं, वह सब स्वरूप मैंने आपसे कहा