Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
बहुनात्र किमुक्तेन मनःकर्मद्रुमाङ्कुरः ।
तस्मिंश्छिन्ने जगच्छाखी छिन्नः कर्मतनुर्भवेत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस विषय में बहुत कहने से क्या मतलब है, मन
ही कर्मरूपी वृक्ष का अंकुर है। मन के नष्ट होने पर भोक्ता के भोग्य भोगाकार में परिणत विहित और
निषिद्ध कर्मरूप शरीरवाला जगतरूपी वृक्ष कट जाता है