Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 40, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 40, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
उत्पद्यन्ते यथा चित्रा ब्रह्मणो भूतजातयः ।
यथा नाशं प्रयान्त्येता यथा मुक्ता भवन्ति हि ॥ २ ॥
यथा च परिवर्धन्ते तिष्ठन्त्यन्तर्हिता यथा ।
संक्षेपेण महाबाहो श्रृणु वक्ष्यामि तेऽनघ ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि जीवों की उत्पत्ति उत्पत्ति प्रकरण में विस्तार से कही गई है, तथापि आगे किये जाने वाले
आक्षेप के उत्थान के लिए तथा विशेष ज्ञान की इच्छा से पुनः यह प्रश्न किया है, ऐसा समझना चाहिए ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महाबाहो, भाँति-भाँति की भूतजातियाँ जैसे ब्रह्म से उत्पन्न होती हैं,
जैसे नाश को प्राप्त होती हैं, जैसे मुक्त होती हैं, जैसे वृद्धि को प्राप्त होती हैं और जैसे ब्रह्म में ही
अन्तर्हित होकर स्थित रहती हैं, उसे मैं संक्षेपतः आपसे कहूँगा, हे अनघ, आप सुनिये