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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verses 6–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

आभासमात्रं हि जगद्धटावटपटभ्रमैः । आवर्तते न सद्रूपात्पृथक्कुड्यादयः स्थिताः ॥ ६ ॥ मनसेदं शरीरं हि वासनार्थं प्रकल्पितम् । कृमिकोशप्रकारेण स्वात्मकोश इव स्वयम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

दीवारआदिरूप जगत सत्‌ से अलग करके दिखलाया नहीं जा सकता। इसलिए भी सत्‌ से पृथक्रूप से उसकी असत्ता है, ऐसा कहते हैं। आभासरूप यह जगत घट, पट, गर्त के भ्रमों से आवर्तित होता है। दीवार आदि सद्रूप से पृथक्‌ नहीं हैं। जैसे रेशम का कीड़ा अपने कोश की स्वयं रचना करता है वैसे ही मन ने अपने निवास के लिए इस शरीर की कल्पना की हे