Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
मायेयं स्वप्नवद्भ्रान्तिर्मिथ्यारचितचक्रिका ।
मनोराज्यमिवालोलसलिलावर्तसुन्दरी ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
सद्रूप से विद्यमान उसकी सत् से ही उत्पत्ति कैसे हो सकती है, यों पूछ रहे श्रीरामचन्द्रजी के प्रति
कहते है।
मिथ्या ही इस चक्र की रचना करनेवाली, चंचल जल की भौरी के समान सुन्दर यह भ्रान्ति के स्वप्न
ओर मनोराज्य के समान माया है