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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 48, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । दाशूराख्यायिकेवेयं सुखसंसारचक्रिका । कल्पनारचिताकारा वस्तुशून्येति किं प्रभो ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले प्रस्तुत दाशूर की आख्यायिका को सुनने की इच्छावाले श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं : हे प्रभो, यह विषयसुख को देनेवाला संसारचक्र दाशूर की आख्यायिका के तुल्य कल्पना द्वारा रचित आकारवाला एवं अवास्तविक है, ऐसा जो आपने कहा, वह कैसे है ? वह आख्यायिका जिस प्रकार की है, उसे वर्णन करने की कृपा कीजिये