Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 49, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ काननमध्यस्थं चुम्बिताम्बुदमण्डलम् ।
मध्याह्नखिन्नसूर्याश्वसेवितस्कन्धमण्डलम् ॥ १ ॥
वितानमिव दिक्कुक्षिदीर्घं विटपबाहुभिः ।
आलोकयन्तं ककुभो विकासिकुसुमेक्षणैः ॥ २ ॥
वातावधूलितानल्पभ्रमद्भ्रमरकुन्तलम् ।
प्रमार्जयन्तमाशानां मुखं पल्लवपाणिभिः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर उसने वन के मध्य में स्थित कदम्ब वृक्ष को
देखा । वह इतना ऊँचा था कि मेघो को छूता था, मध्याह्न के समय थके हुए सूर्य के घोडे उसके
स्कन्ध प्रदेश में विश्राम लेते थे, वह अपनी शाखारूपी बाहुओं से दिशाओं के मध्य भाग के समान
विशाल वितान की रचना कर रहा था, फूले हुए फूलरूपी नेत्रों से मेरी शाखाओं के वितान से अनावृत
बचा हुआ ओर कोई प्रदेश है या नहीं ? यों मानों दिशाओं को देख रहा था, तेज वायु बहने के कारण
परागरहित होकर घूम रहे प्रचुर भवर ही उसके केश थे, वह अपने पल्लवरूपी हाथों से दिशारूपी
कान्ताओं का मुख पोंछ रहा था
सर्ग सन्दर्भ
अड़तालीसवाँ सर्ग समाप्त उनचासवाँ सर्ग शाखा, पल्लव, पुष्प, फल और पक्षियों से मनोहर कदम्ब वृक्ष का उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों से वर्णन ।