Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 49, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
मातङ्गकटघृष्टेन जानुस्तब्धेन पीठिना ।
आभोगिना बद्धपदं तरुणेव महाचलम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
वनगज के गण्डस्थल से धिसे हुए अतएव अत्यन्त उन्नत ऊपर को जानू
किये हुए पुरुष की जानू के समान निश्चल, पीठ के समान चौड विशाल मूल प्रदेश से वह ऐसे स्थित
था जैसे कि नीचे की भूमि में उगे हुए वृक्षो से महापर्वत स्थित रहता है