Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, Verses 5–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 49, verses 5–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 5-7
संस्कृत श्लोक
लताविलसितोल्लासैः पुष्पकेसरधूलिभिः ।
आबद्धमण्डलाभोगं पूर्णेन्दुमिव दीप्तिभिः ॥ ५ ॥
संकटं विटपावल्या कुञ्जकूजच्चकोरया ।
छन्नया सिद्धवीथ्येव जगदुच्चतया श्रितम् ॥ ६ ॥
स्कन्धपीठोपविष्टानां लम्बमानैः कलापिनाम् ।
कलापैः शोभितं व्योम सेन्द्रचापैरिवाम्बुदैः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
लताओं की अत्यन्त शोभा से
उल्लसित हो रहे फूलों के केसर मेँ स्थित परागों से उसने मण्डलाकार वेश बना रखा था । दीप्ति से
वह चन्द्रमा की तरह प्रतीत होता था । शाखाओं की परम्पराओं से, जिनकी लताओं से आवृत प्रदेशों
में चकोर शब्द करते थे, वह व्याप्त था ग्रह, नक्षत्र, तारा, विमान आदि से आवृत सिद्धमार्ग से
उन्नतरूप से आश्रित ब्रह्माण्ड की तरह वह स्थित था, कन्धे ओर चोटी पर बैठे हुए मयूरो के लटक
रहे मोरपंखों से ओर इन्द्रधनुष से युक्त मेघो से आकाश के समान सुशोभित था