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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 50, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 50, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अथोपविश्य मृदुनि नवपल्लवविष्टरे । क्षणमालोकितास्तेन दिशः कौतुकचञ्चलम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर कोमल नव नव पल्वरूपी आसन पर बैठकर कौतुकवश चंचल दृष्टि होकर उन्होने एकक्षण भर दिशाएँ देखी