Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 50, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 50, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
सरिदेकावलीरम्याः शैलेन्द्रस्तनकुड्मलाः ।
निर्मलाकाशकबरा लोलनीलाम्बुदालकाः ॥ ५ ॥
नीलपल्लववसनाः पुष्पपूरावतंसिकाः ।
गृहीतसागरापूर्णकलशाः पुरुभूषणाः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
वे
नदी रूपी एकावली से रमणीय थी, पर्वतराज ही उनके स्तन थे, निर्मल आकाश ही उनकी केशराशि
थी, चंचल नील मेच ही उनके अलक थे, नीले (हरे-भरे) पल्लव ही उनके वस्त्र थे, पुष्पराशिर्यो ही
उनके अवतंस (कर्ण का भूषण या शिरोमाला) थे । सागररूपी भरे कलश उन्होने हाथ में ले रक्खे थे
और वे अनेक आभूषणों से भूषित थी