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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verses 36–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 53, verses 36–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

रजोरूपो हि संकल्पो लोकसंव्यवहारवान् । परितिष्ठति संसारे पुत्रदारानुरञ्जितः ॥ ३६ ॥ त्रिविधं तु परित्यज्य रूपमेतन्महामते । संकल्पः परमायाति पदमात्मपरिक्षये ॥ ३७ ॥ सर्वा दृष्टीः परित्यज्य नियम्य मनसा मनः । सबाह्याभ्यन्तरार्थस्य संकल्पस्य क्षयं कुरु ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

रजोरुप संकल्प मनुष्यरूप जन्म से मनुष्योचित व्यवहारवाला होता है, वह संसार में पुत्र, स्त्री आदि से अनुरंजित होकर रहता हे