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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verses 39–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 53, verses 39–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 39-42

संस्कृत श्लोक

यदि वर्षसहस्राणि तपश्चरसि दारुणम् । यदि वा विलयात्मानं शिलायां चूर्णयस्यलम् ॥ ३९ ॥ यदि वाग्निं प्रविशसि वडवाग्निमथापि वा । यदि वा पतसि श्वभ्रे खड्गधाराजवेतथा ॥ ४० ॥ हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । अत्यन्तकरुणाक्रान्तो लोकनाथोऽथवा यतिः ॥ ४१ ॥ पातालस्थस्य भूस्थस्य स्वर्गस्थस्यापि तत्तव । नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति संकल्पोपशमादृते ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महामते, तीन प्रकार के इस स्वरूप को त्याग कर संकल्प: आत्यन्तिक संकल्पोच्छेद होने पर मोक्षरूप परम पद को प्राप्त होता है ॥ ३ ७॥ संकल्प के क्षय में कौन उपाय है, ऐसा प्रश्न होने पर उसे कहते हैं। हे पुत्र, सब बाह्य दृष्टियों का त्याग करके, मन से मन का नियमन करके तुम बाह्य ओर आभ्यन्तर पदार्थों के साथ संकल्पो का विनाश करो ॥३ ८॥ यदि कोई शंका करे कि संकल्प का विनाश दुष्कर है। अन्य किसी उपाय का मोक्ष के लिए उपदेश दीजिये, तो इस पर अन्य उपाय नहीं है ऐसा कहते हैं। यदि हजारों वर्षों तक तुम घोर तपस्या करो, यदि अपने शरीर को शिला पर पटक कर चूर- चूर कर डालो, यदि अग्नि में प्रवेश करो अथवा बड़वानल में प्रवेश करो, गड्डे में गिरो, यदि खड्गधारा के वेग में प्रवेश करो, यदि साक्षात्‌ शिवजी तुम्हें उपदेश देनेवाले हों अथवा साक्षात्‌ विष्णु उपदेश कहें या भगवान ब्रह्मा उपदेशक हो अथवा अत्यन्त दयालू श्रीदत्तात्रेय उपदेशक हो, चाहे तुम पाताल में रहो, चाहे पृथ्वी पर रहो, चाहे स्वर्ग में ही क्यों न रहो, तुम्हारे लिए संकल्प की शान्ति के सिवा दूसरा उपाय नहीं है