Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 54, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
भावमात्रोपसंपन्ने स्वात्मनि स्थितिमागते ।
साध्यते यदसाध्यं तत्कस्य स्यात्किमिवाङ्ग ते ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्प का क्षय होने से दुःखक्षय होने पर भी निरतिशय आनन्द की प्राप्ति किस उपाय से हो
सकती है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं।
निरन्तर अपनी पूर्णानन्दात्मता के चिन्तनमात्र से प्राप्त हुई स्वात्मा में स्थिति को (स्वरूपाप्रच्युति
को) प्राप्त होने पर जो वस्तु असाध्य है, वह भी साध्य हो जाती है।
शंका : जो वस्तु असाध्य है, वह साध्य हो जाती है, यह कथन तो विपरीत है ?
समाधान : वह स्वरूपस्थिति स्वतः सिद्ध है, कभी नष्ट नहीं होती, इस आशय से उसे असाध्य
कहा और वह उत्पन्न होती है, इस आशय से उसे साध्य कहा। भावों की निवृत्ति दो प्रकार की है, दूसरे
द्वारा अपहत होने पर अथवा नाश से दूसरे जन्म की प्राप्ति होने पर
हे पुत्र तुम्हारा आत्मा अन्य से अपहत होता हुआ किसका होगा; क्योकि अद्वितीय आत्मा से
अतिरिक्त कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं है, अथवा नष्ट होता हुआ वह भला क्या वस्तु होगा ? घट तो नष्ट
होता हुआ कपाल बनता है, पर आत्मा क्या होगा ? जो होगा वह नष्ट हुए आत्मा से देखा ही नहीं जा
सकता। आत्मा से अन्य कोई द्रष्टा है ही नहीं, इसलिए निःसाक्षिक आत्मनाश सिद्ध हो ही नहीं सकता ।
इसलिए आत्मरूप मोक्ष स्वतःसिद्ध है न कि असत् ही उत्पन्न होता है