Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 54, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मनो जीवः स्फुरत्युच्चैर्मानसं नगरं जगत् ।
भविष्यद्वर्तमानं च भूतं च परिवर्तयन् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
मन ही चित् के प्रतिबिम्ब से जीव होकर मनोरथ से कल्पित नगररूपी भूत,
भविष्य ओर वर्तमान जगत की रचना करता हुआ, वृद्धि करता हुआ ओर विनाश करता हुआ खूब
स्फुरित होता है