Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 58, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 58, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

उच्चारयन्नोङ्कारं च घण्टास्वनमिव क्रमात् । ओंकारस्य कलामात्रं पाश्चात्यं वालकोमलम् । नान्तरस्थो न बाह्यस्थो भावयन्परमे हृदि ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

विशुद्ध आत्मा को उन्होने किस प्रमाण से देखा, इस पर कहते हैं। क्रमशः घण्टानाद की तरह ॐकार का उच्चारण करते हुए उन्होने देखा | श्रुति भी है प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्‌ तन्मयो भवेत्‌ ॥ अर्थात्‌ प्रणव धनुष है, जीवात्मा बाण है, ब्रह्म लक्ष्य है। अप्रमत्त होकर उसका वेध करना चाहिये । वेधन करने के पश्चात बाण के समान तन्मय होना चाहिये । यदि कोई शंका करे कि ३6कार में आकारादिमात्रा् विराट्‌ आदि की वाचक हे । तुरीय तत्व को उकार के किस अंश से देखा ? इस पर कहते हैं। पूर्वपूर्वं मात्राओं का विराटादि अर्थो के साथ उत्तरोत्तर मात्राओं मे लय करके बाल के समान ॐकार के सिर पर दिखाई देनेवाला, अति सूक्ष्म और कोमल, सबसे पीछे के अर्धमात्ररूप कलामात्र की, जो सबके विषय का चरम सीमारूप तुरीयतत्त्व है, तुरीयात्मा से ही भावना करते हुए तुरीयभावापन्न होकर न तो आन्तरकारण में स्थित और न बाह्यभूत कार्य मेँ वे आगे कहे जानेवाले प्रकार से स्थित हुए