Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 58, Verses 4–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 58, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
स तेन निर्विण्ण इव सदात्मत्वादृते पदम् ।
अपश्यन्समुवाचेदमेको गद्गदया गिरा ॥ ४ ॥
किं करोमि क्व गच्छामि किं गृह्णामि त्यजामि किम् ।
आत्मना पूरितं विश्वं महाकल्पाम्बुना यथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य में न रमने के कारण सद्रूप एेकात्म्य से अतिरिक्त वस्तुको न
देखते हुए, एकमात्र आत्मवस्तु का परिशेष होने से उदास हुए- से एकाकी उन्होने हर्ष से गद्गद् हुई
वाणी से यह कहा : मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किसका ग्रहण करूँ ओर किसका त्याग करूँ ? जैसे
महाप्रलय के जल से संसार भरा होता हे वैसे ही यह सारा विश्व आत्मा से भरा हुआ हे