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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 58, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 58, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

दुःखमात्मा सुखं चैव खमाशासुमहत्तया । सर्वमात्ममयं ज्ञातं नष्टकष्टोऽहमात्मना ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे, जीवात्मा के जो सुख साधन हैं, उन्हें करो, वे सुख साधन जहाँ प्राप्त हो वहाँ जाओ, सुख ओर सुख के साधनो का ग्रहण करो एवं दुःख के साधन ओर दुःख का त्याग करो, तो इस पर कहते हैं। दुःख, दुःख का उपभोग करनेवाले जीव और जीव की अभिलाषा के योग्य सुख इत्यादि सारा जगत यदि मूल का अन्वेषण किया जाय, तो आकाशमात्र ही है, फिर भी दिशाओं से ओर मनोरथं से सुमहान वह आत्ममय है यानी आत्मा ही है, ऐसा मुझे ज्ञात हो गया, अतः उसी आनन्दैकरस आत्मा से मेरा सब दुःख नष्ट हो गया है, इसलिए किसी वस्तु के त्याग और किसी वस्तु के ग्रहण की मुझे आवश्यकता नहीं है