Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verses 22–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
अथ ब्रह्मा महाबुद्धिरन्यास्तास्तेजसः कलाः ।
अपाल्य यदसद्ब्रह्मा तरङ्गानिव सागरः ॥ २२ ॥
तेऽपि संकल्पसंप्राप्तसिद्धयः समशक्तयः ।
यथासंकल्पितं वस्तु क्षणाद्दृष्ट्वापुरग्रतः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर मरीचि आदि प्रजापतियों की सृष्टि कहते हैं।
तदनन्तर विश्व की वृद्धि करनेवाले सर्वज्ञ चतुर्मुख ब्रह्मा ने जैसे सागर तरगों को विभक्त करता
है वैसे ही आदित्य आदि के निर्माण से बची हुई तेज की उन कलाओं को विभक्त कर जिनका नौ
प्रकार से निर्माण किया, वे भी तेज के टुकड़े ब्रह्माजी के संकल्प से ही सब सिद्धियों को प्राप्त ओर
ब्रह्मा के समान ही शक्तिवाले प्रजापति होकर संकल्पानुसार वस्तु को क्षणभर में ही अपने आगे
देखकर प्राप्त करते थे